बरसता भीगता मौसम वे बजह सा लगे,
न शामे हैं सिन्दूरी, न सुबह सुबह सी लगे,
तुम आओगे जब वापस ,तब लौटेंगे वो मौसम,
अभी तो न गाँव न बस्ती न घर घर सा लगें।
एक अँधेरी सी है रात बेहद तन्हां उदास,
रूठे रूठे से हैं सारे एहसास लौट आओ,
साथ बिताए पल कहते हैं देखो हम कैसे बैठे हैं,
बेजार सी उड़ती हैं यादें हर तरफ बीहड़ सा लगे।
यह सख्त सर्दियां जो हैं नर्म तुमसे,
यह उमस गर्मियां जो हैं ठंडक तुमसे,
यह बारिशें फुहारें जो हैं मगन तुमसे,
क्या तुम्हें भी मेरे बिन यह सब एक वेसबब सा लगे।
हँसना, और मुस्कुराना है गुनाह,
न मिले जो तेरी पनाह,
सजना सँवरना आईने से मिलना,
दिल को बड़ा नागवार बड़ा बे अदब सा लगे।
हर तरफ है अजीब सूनापन,
झुलसे मन ,भीगे है दर्द से विरहन
जिन्दगी में सब कुछ होकर भी,
जिन्दा हैं क्या हम सासों का चलना वहम से लगे।
वो सरगोशियां ,खो गयीं जाने कहाँ,
तरन्नुम लबों की है जुदा जुदा,
वो रौनके सब तेरे सँग गयीं,
बड़े बोझ से भरे कदम यह लगे।
अंजू दीक्षित,
बदायूँ, उत्तर प्रदेश।

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