तुम मिले थे! उन चाँदनी रातों में। 
चांद की परछाई, समुद्र में, और तेरी
परछाई मुझ में समायी थी। 
मेरे दिल के बहुत करीब थे तुम। 

क्या कहा था तूने? " मुस्कान! यही नाम, 
दिया था ना मुझे! और तुम मेरे साहिल बन गये! 
हमेशा के लिए। 
वो शिव जी का मंदिर, सामने नदी का किनारा। 
वो मार्च महीने की जाती हुई सर्द रात। 

तेरे साथ, पहली बार , रात में घूमने का एहसास।
फिर समय बीतते बीतते कैसे, 
हमारी शादी के तेरह साल कैसे गुजर गये, 
तेरी मोहब्बत ने पता भी ना चलने दिया। 

साहिल! तुमने मुझे, ढेर सारा प्यार और हर्ष, ऋषभ, 
देकर मेरी मुस्कान को एक नया आयाम दिया। 
तू हमेशा मेरा " साहिल " रहे, रहे तेरे जिंदगी में तेरी ये
मुस्कान! 
तुम मिले, गुल खिले जीने को और क्या चाहिए।

श्वेता कर्ण! 
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