रेत के झरने से
कब बुझती है प्यास।
झरना निर्मल नीर का
बुझाता जग की प्यास।

मृगमरीचिका में 
खोज रहा आनंद 
विषय भोगों की 
बुझती नहीं प्यास 

घृत डालता रहा 
अग्नि न बुझी 
चार बूंदें जल की 
शांत हुई आग 

रेत का झरना 
सिर्फ मायाजाल 
सत्य से दूर 
भ्रम मन का 

खुद के लिये 
जीते रहे बहुत 
कुछ मर दूजों के लिये 
हो गये अमर 

वासना को प्रेम 
मान लो, न है सच 
प्रेम त्याग का 
दूसरा ही रूप 

पतन में उत्थान 
देखता मानव 
रेत प्रपात में 
बुझा रहा निज प्यास

रचनाकार : दिवा शंकर सारस्वत 'प्रशांत'