"दीदी दीदी,बारात आ गई है",वंदिता ने आकर बताया ।"और पता है शालू और अर्पिता (उसकी सहेलियां)बोल रही कि तेरे जीजू तो कितने हैंडसम हैं।"सुनकर दुल्हन बनी नंदिनी के गाल और सुर्ख हो गए।तभी उनकी बड़ी बहन गीतिका ने आवाज दी-"वन्दु ऊपर क्या कर रही है,यहाँ आकर देख न ईलू रो रही है।"इतना सुनकर वो अपनी दी की बेटी ईलू को चुप कराने चली गई।
सभी लोग बारात के स्वागत में व्यस्त थे।फिर जयमाला हुई।शादी में आये लोग जहाँ नंदिनी और नीरज की जोड़ी की बलायें ले रहे थे ,वहीं नीरज की भाभी रूपा की सुंदरता की भी तारीफ कर रहे थे।जो हर रस्मों में अपने देवर के आसपास ही थी।नीरज के भैया नवल की तबियत ठीक नही थी,इस कारन वो शादी में नही आ पाए थे।पर रूपा अपने पति को छोड़ देवर की शादी की जिम्मेदारी निभा रही थी।उसका अपने देवर के प्रति झुकाव सहज ही समझ आ रहा था।सभी उन्हें लक्ष्मण और सीता की उपमा दे रहे थे।सारी रस्मे पूरी होकर विदाई की घड़ी आई।
रायपुर के संपन्न व्यापारी की बेटी ,सारे सुखों में पली नंदिनी के विवाह में माता पिता ने कोई कमी नही रखी थी।तीन बहनों में मंझली नंदिनी देखने में सबसे सुंदर और गुणवंती थी, विवाह योग्य होने पर कई जगह बात चली पर संपन्न पिता संतुष्ट नही हो पाए,अंततः वाराणसी के धनाड्य परिवार में उनको अपनी बेटी का सुखद भविष्य के आसार दिखे,नीरज आकर्षक थे,ज्यादा बात नही करते थे।औपचारिक देखना दिखाना करके रिश्ता तय कर दिया गया।सबने कहा भी कि इतनी दूर शादी क्यों कर रहे?परन्तु सबको समझा दिया कि संयोग वहीं का था ।और 15 दिनों के कम समय में ही विवाह संपन्न भी हो गया। परिवार और रिश्तेदारों ने व्याकुल मन से अपनी लाड़ली बेटी को विदा किया।
मन में ढेर सारे सपने और उमंगें लिए नंदिनी अपने साजन के घर के लिए निकल पड़ी।
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शेष कहानी अगले भाग में......
कृपया पढ़कर समीक्षा अवश्य करें।धन्यवाद
✍🏻प्रीति ताम्रकार
जबलपुर

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