भूख की आग में 
झुलसती अंतणियाँ 
सिसकियाँ भरतीं
छिपी बैठीं हैं 
उदर के 
किसी अनजान 
सूने कौने में
वहीं 
दुर्दिनों में स्वजनों (घुटनों) 
द्वारा त्रस्त होकर 
निराश्रित 
उदर
चिपका बैठा है 
जूही की लता में
किसी 
निश्चेष्ट गिल्लू की भाँति
पीठ से चिपका हुआ 
जर्जर बचपन भी
खोयी किलकारियों को
ढूँढता हुआ
अग्रसर है जीवन
के 
अन्तिम पड़ाव की ओर। 

                 देवयानी भारद्वाज
              उसायनी फीरोजाबाद