कविता तुम भोली हो,
तुम प्रवाहिनी भी हो
सदा से बहती आई हो
कुछ कहती आई हो
कुछ बदल भी गई हो
अब रस छंद से नही हो
अब तो उन्मुक्त गगन की
पंछी हो गई हो ,अब तुम
बदल गई हो
परिवर्तन संसार का नियम है
उसमे तुम ढल गई हो
जिसने जैसे सोच कर रचा
तुम उसी रूप मे हो गई
न तुमने कुछ कहा
बस सहती गई
कविता कहती गई
कविता अब तुम बदल गई हो🌹🌹🌹
डॉ सुरभि जैंन " श्रुति"

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