सपनों की दहलीज पर
बैठी एक शाम सुहानी,

तिनका तिनका खोजा 
उसने बन सपनों की रानी,

ऊपर ऊंचा नील गगन
नीचे धरती गहरी ,

छोटे छोटे,भागों में 
बांट गई बनकर एक पहेली ,

पकड़ वसुधा को चलना है
नभ में भी उड़ना है,

अपने सपनों को बुनना है
हकीक़त में भी बदलना है,

उंगलियां उठने लगी अब
व्यंग बाण भी झेला है,

राह के पत्थरों को ,
सुमन विजय सा चुनना है !!!

      कीर्ति चौरसिया
       जबलपुर( मध्य प्रदेश)