मैं 
मरना चाहती हूं
क्या तुम 
मेरे साथ मरना चाहोगे
क्या कहा
नहीं
हां मैं भली प्रकार जानती थी
तुम मेरी जिन्दगी या
मौत को कहां चाहते हो
तुम तो
सिर्फ और सिर्फ
मुझे ही हमेशा हमेशा चाहते रहे थे
पर हां 
मैं
कोई जिस्म नहीं
मैं तो मासूम सा एक दिल हूं 
जो बच्चे सा
खिलखिलाता
कोमलता और निश्छलता के साथ
जीना चाहता था
जिसकी आकांक्षाएं एक पंक्षी की भांति
उन्मुक्त गगन में
स्वच्छन्द उड़ान भरते हुए
चांद को पाने की थीं
मगर अब बचा ही क्या है
मेरे ही सजातीय
पंक्षियों ने मुझे स्वच्छन्द उड़ान भरते देख
मेरे पर जो नौंच डाले
पर आज भी मैं अपराजिता हूं।
                                                                              
                देवयानी भारद्वाज
             उसायनी फीरोजाबाद