मैं कौन हूँ
जानते हो क्या
नहीं न
बताती हूँ
मैं अभिशप्त हूँ
जो मंजिल के पास तक पहुँचती हूँ
और अचानक खो जाती है मेरी
मंजिल
छूट जाती हैं राहें
कहीं पीछे बहुत पीछे
क्योंकि मैं अभिशप्त हूँ
मैं प्यास हूँ
वह प्यास
जो सागर के बीच
डूबती उतराती हुई भी
तृप्त नहीं हो पाती
और किसी कुनदिका के किनारे बैठ
करती है एक
टिटहरी प्रयास
खुद ही खुद को शान्ति देने का
खुद में खुद को खोज पाने का
क्योंकि मैं अभिशप्त हूँ
मैं शमां हूँ
वह शमां जो जलती जाती है अनवरत
पर के लिए
और पिघलाती जाती है
पर की तपिश से
स्वयं को
और अन्त में पाती है
गहन अँधेरे
अपने लिए
क्योंकि मैं अभिशप्त हूँ
मैं निशा हूँ
वह निशा जो
श्रमित थकित तपते जलते
दिनकर को
अपने आगोश में ले
नहलाती है
शबनमी बरसात में
और स्वयं तरसती रहती है
एक सुखद सबेरे के लिए
चकवी की तरह
क्योंकि मैं अभिशप्त हूँ
मैं चाँदनी हूँ
वह चाँदनी
जो विरह व्यथित व्याकुल जन को
अपनी शीतल छुअन से राहत देती
खुद जलती रहती है
विरहा की आग में
चाँद से दूर
बहुत दूर
क्योंकि मैं अभिशप्त हूँ
मैं कैकेई भी हूँ
वह कैकेई
जो क्षात्र धर्म का पालन करते हुए
परमार्थ में पूत और पति को भी त्याग
स्वयं अधर्म की मूर्ति बनकर रह जाती है
धर्म की सूत्रधार होकर भी
क्योंकि मैं अभिशप्त हूँ
मैं नारी हूँ
वह नारी
जो
एक पुरुष को अपना उदर चीरकर
दुनिया में लाती है
और अपने खून की एक एक बूँद से सींचती हुई
उसे सबल और सशक्त बनाती है
और उसी पुरुष के हाथों
किसी न किसी रूप में
छली कुचली जाकर
अबला ही कहलाती है
क्योंकि मैं अभिशप्त जो हूँ ।।
देवयानी भारद्वाज
उसायनी फीरोजाबाद

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