माँ !परिवार का अहम हिस्सा होती है। माँ के बिना परिवार की कल्पना ही अधूरी है। गायत्री जी अपने बेटे बहु और दो प्यारे पोतों के साथ शहर में रहती थी। बेटे बहु जब ऑफिस चले जाते तो गायत्री जी दोनों बच्चों की देखभाल करती थी। 
  गायत्री जी ने बहुत दुःख उठाकर अपने बेटे को पढ़ाया। लेकिन अब बुढ़ापे के कारण उनसे अधिक काम नहीं होते थे। उनकी बहु इसी बात से चिढ़ा करती थी कि माँ जी तो कुछ करती ही नहीं। बच्चे अपनी दादी से बहुत प्यार करते थे। 
हमारे घर में बड़े बूढ़े होना कितना जरूरी होते हैं, चाहे वो कोई काम करें या ना करें। फिर भी सब कुछ ठीक ही चल रहा था पर एक दिन गायत्री जी के बहु और बेटों ने ऑफिस से घर आने समय ही कुछ सोच लिया था और? 
फिर गायत्री जी के बेटे ने कहा माँ! कल सबेरे आप अपना बैग पैक कर लेना। मैं आपको बृद्ध आश्रम छोड़ देंगे क्योंकि
हम लोग ऑफिस चले जाते हैं तो आप घर पर अकेले हो जाती हैं। 
गायत्री जी चुपचाप सुनती रही और सारी रात रो कर गुजार दी। सुबह वो अपने बेटे के साथ अपना सामान ले कर निकल गई। उनके बेटे ने उन्हें बृद्ध आश्रम छोड़ दिया। गायत्री जी का बेटा जब वहाँ से वापस आ रहा था तो उसने गायत्री जी को वहाँ के गार्ड से बात करते सुना और रुक कर उनकी बातों को सुनने लगा। 
गार्ड ने गायत्री जी से पूछा? आप यहाँ!? इतने सालों बाद। 
किससे मिलने आई हैं आप। 
गायत्री जी ने कहा! मैं यहाँ रहने आई हूँ और ऐसा कहकर वो अंदर चली गई। 
गायत्री जी का बेटा गार्ड के पास पहुँच कर उससे पूछा कि आप उस औरत को कैसे जानते हैं। 
गार्ड ने कहा। बहुत भली औरत है, इसने अपने जीवन में बहुत से नेक काम किये, पता नहीं आज क्यों यहाँ रहने आ गई है। 
गायत्री जी के बेटे ने कहा! ऐसा क्या नेक काम किया है इसने जो आप इनकी तारीफ कर रहे हो। 
गार्ड ने कहा। बहुत साल पहले गायत्री जी यहाँ हमलोगों से मिलने आई थी। यहाँ पर कोई एक बच्चा छोड़ कर चला गया था और कोई उस बच्चे को अपनाने को तैयार नहीं था। 
वो बच्चा भूख से रो रहा था। कोई उसे हाथ भी नहीं लगा रहा था। तब गायत्री जी ने उस बच्चे को अपने गोद में लिया और उस दिन से उस बच्चे को पालने की जिम्मेदारी उठाई। 
गायत्री जी ने एक अनाथ बच्चे को इतना प्यार दिया, पढ़ा लिखा कर लायक बनाया और आज उस बच्चे ने उन्हें यहाँ रहने भेज दिया। 
उनके बेटे को यह एहसास हुआ कि, जिस माँ ने मुझ अनाथ को कभी ये एहसास नहीं होने दिया कि मैं उनका अपना बेटा नहीं हूँ। उस माँ को मैं वहीं छोड़ आया जहाँ से कभी वो मुझे लाई थी। 
फिर गायत्री जी के बेटे ने अपनी माँ से माफी माँग कर उन्हें वापस घर ले आया। 
माँ तो माँ होती है। माँ ही वो हस्ती है जो, अपने बच्चों के लाख गलती को क्षमा कर देती है और उनके होठों से हमेशा अपने बच्चों के लिए दुआ ही निकलती है। 

            श्वेता कर्ण