सोलह साल के रघु को फिल्मी गाने सुनने का बहुत शौक था । 
वह हमेशा सोचता, काश मेरे पास भी मेरा अपना रेडियो होता । कई बार बापू से जिद भी की  रेडियो लेने की, परंतु घर की स्थिति ऐसी नहीं थी कि खाने - पहनने के अलावा किसी और चीज पर पैसा खर्च किया जाए । उम्र के जिस दौर से वह गुजर रहा था उसे यह कुछ समझ नहीं आता था या समझना ही नहीं चाहता था । रघु का एक कमरे का छोटा सा घर था जिसमें रघु के दो भाई एक बहन और माता-पिता रहते । उसे कमरे में ही बनी मचानी पर जाकर सोना पड़ता । जिसमें एक खिड़की थी जो बाहर गली में खुलती थी । बापू के रेडियो लेने से इनकार करने के बाद रघु उदास हो गया । 
एक दिन वह अपने चाचा के पास गया जो कि थोड़ी दूरी पर रहते थे । चाचा के पास रेडियो देखकर रघु बहुत खुश हुआ और झिझकते हुए बोला, "चाचा क्या आप अपना रेडियो मुझे दो दिन के लिए दे दोगे ?"
चाचा ने कहा, "अरे ऐसे डरते हुए क्यों बोल रहा है ? जा ले जा मजे कर ।"
रघु की खुशी का ठिकाना नहीं रहा । वह रेडियो को छुपाए घर में आया और अपनी मचानी पर रख दिया । अब रोज रात को रेडियो की आवाज बहुत धीमी करके रेडियो को कान से लगाकर गाने सुनता । वह अपने आप को राजा से कम महसूस नहीं कर रहा था । वह सारा दिन बहुत खुश रहता । उसके होठों पर मुस्कान चिपक सी गई थी जैसे कोई खजाना मिल गया हो । 
एक दिन रघु की सुबह आंख खुली तो उसे मचानी पर रेडियो कहीं दिखाई नहीं दिया । वह पागलों की तरह उसे ढूंढने लगा । लेकिन रेडियो उसे नहीं मिला । उसे काटो तो खून नहीं जैसी हालत हो गई । वह किसी से पूछ भी नहीं सकता था क्योंकि उसकी पोल खुल जाती कि वह रात को पढ़ाई की जगह रेडियो सुनता है और बिना किसी को बताए चाचा से रेडियो लेकर आया है । उसने गोल-गोल बातें घुमा कर घर में सबसे पूछने की कोशिश की लेकिन उसे कुछ पता ना चला । रघु को बापू से डर लगने लगा कि उन्हें पता चला कि रेडियो घर में आया था और गुम हो गया तो जम कर पिटाई निश्चित है । चाचा भी जब रेडियो मांगेंगे तो वह क्या जवाब देगा ?
वह अब चाचा के पास भी नहीं जाता और चाचा सामने दिखते तो तुरंत रास्ता बदल देता । चाचा भी उसकी इस हरकत से परेशान थे कि इसे क्या हुआ कल तक तो मुझसे खूब बतियाता था, आजकल देखता भी नहीं है ।
एक दिन रघु घर आया तो चाचा को बैठा पाया । चाचा से नजर मिल चुकी थी तो वापस पलट भी नहीं सकता था । वह मरे कदमों से आकर बैठ गया ।
चाचा बोले, "रघु क्या हुआ ? आजकल तू बात भी नहीं करता । मुझसे दूर-दूर रहता है । कोई परेशानी है क्या ? मुझे बता ।"
रघु द्रवित हो गया उसकी आंखों में आंसू आ गए । वह बोला, "चाचा, आपका रेडियो मुझसे गुम हो गया । लगता है मेरी मचानी की खिड़की से किसी ने निकाल लिया ।"
चाचा बहुत जोर से हंसे और बोले, "रघु कैसी बातें कर रहा है ? रेडियो तो तूने मुझे अपने हाथ से ही वापस किया था ।" अब चौंकने की बारी रघु की थी । वह बोला, "नहीं तो, मैंने तो आपको रेडियो दिया ही नहीं ।"
चाचा बोले, "जब तू मुझसे रेडियो लेकर गया था उसके दो दिन बाद मैं सुबह-सुबह आया था । तू मचानी पर सो रहा था । मैंने तुझे जगाकर रेडियो मांगा । तूने मुझे रेडियो दे दिया ।"
रघु हैरान - परेशान हो गया कि यह उसने कब और कैसे कर दिया । उसे तो कुछ भी याद नहीं ।
चाचा बोले, "तू नींदों में था शायद इसलिए तुझे कुछ याद नहीं है लेकिन तू मुझे रेडियो वापिस कर चुका है । अब मैं समझा इसीलिए मुझे देख कर तुम रास्ता बदल देते थे । चाचा ने प्यार से रघु को देखते हुए कहा, "पागल, अगर रेडियो गुम भी हो जाता तो क्या हो जाता ? तू मुझे बता देता बेकार इतने दिनों से परेशान होता रहा ‌।"
रघु झेंप गया लेकिन अब उसे सुकून मिला था । बहुत दिनों से वह अपने सिर पर बोझ लिए घूम रहा था ।



                      धनु दयाल