अपने करम के 'वाण' से
ऐसा बनाओ,तुम रास्ता
मुश्किल भी कितनी,जोर दें तो 
टूटे नहीं,उम्मीदें दांसता
अपने करम के......


      उस वक्त क्या कर सकते हो तुम? 
      जिस वक्त ना कोई 'बल' मिले 
      अपने होंसलो के,रथ पर चढ़कर
      आगे निकल जाओगे तुम 
      अपने करम के......


इज्जत की 'पगड़ी' तुम पहनकर
'रिश्ते-नाते' तुम सब जोड़ोगे
हकीकत की परवाहों से लड़कर
अँधियारों में ढ़ूढ़ लेंगे "आसरा"
अपने करम के......


      उस वक्त को याद करलो
      जब 'इंसानियत' हो जाओगे
      तुम "कर्म" के मानव,हो जगत के
      सभी 'लक्षों' को भेदते जाओगे
      अपने करम के......




        लेखक:-विकास कुमार लाभ
                       मधुबनी (बिहार)