जैसा कि मैंने पहली पोस्ट पर लिखा था कि 8 मार्च अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस के उपलक्ष में, मैं 21 महिलाओं के बारे में लिखूंँगी, अब तक 20 महिलाओं के बारे में आप पढ़ चुके हैं और बहुत बहुत सराहना आपने की, इसके लिए कोटि-कोटि धन्यवाद।
उस दिन यूंही रसोई में खाना बनाते हुए यह ख्याल आया कि महिला दिवस आने वाला है, किस महिला पर लिखूंँ फिर सोचा बहुत सारी हैं चलो 21 महिलाओं पर लिखती हूंँ। विश्वास कीजिए कोई लिस्ट नहीं बनाई के किस पर लिखूंगी, पूरे दिन के बाद जब रात को फोन उठाती हूंँ जिस महिला का नाम एकदम से मन में आ गया उसी के बारे में मैंने लिख दिया।
कुछ देर पहले तक भी नहीं सोचा की अगली कौन होगी, 
यह सभी भारतीय महिलाएं किसी परिचय की मोहताज नहीं है बस मैं माध्यम बनी हूंँ आप तक इनकी प्रसिद्धि और ज्यादा हो जाने के लिए। ऐसे ही जब आज फोन उठाया तो मेरे मन में नाम आया दीपा मलिक का

भारत की पहली पैरा एथलीट महिला जिनको 'खेल रत्न' मिला 2019 में।

दीपा मलिक 30 सितंबर 1970 में सोनीपत में पैदा हुई, वे सेना के अधिकारी की पत्नी और दो बच्चों की मां है।
*2009 में शॉर्ट पुट में दीपा मलिक ने पहला कांस्य पदक जीता और इसके बाद अगले साल इंग्लैंड में शॉट पुट डिस्क थ्रो और जेवलिन तीनों में गोल्ड मेडल जीते।
*फिर चाइना में पैरा एशियन गेम्स में कांस्य पदक जीता और वह कांस्य पदक जीतने वाली पहली भारतीय महिला बनी।
*दीपा ने 2011 वर्ल्ड एथलेटिक्स चैंपियन में रजत पदक जीता।
इसी साल में शाहजहां में वर्ल्ड गेम्स में दो कांस्य पदक जीते।
फिर 2012 मलेशिया ओपन एथलीट चैंपियन में जेवलिन व डिस्क थ्रो में दो स्वर्ण पदक।
2014 चाइना ओपन एथलेटिक्स चैंपियन बीजिंग में शॉट पुट में स्वर्ण पदक।

*दीपा मलिक के सितारे बुलंदियों पर हैं हम कह सकते हैं किंतु इसके पीछे छिपा है उनका ऐसा संघर्ष जिसे सुनकर ही रोंगटे खड़े हो जाए।
मात्र 30 साल की आयु में तीन टयूमर सर्जरी और उनके शरीर का निचला हिस्सा सुन हो जाने के बावजूद उन्होंने अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में पदक जीते हैं। इसके अतिरिक्त तैराकी मोटर रेसिंग कई स्पर्धाओं में हिस्सा लिया भारत के राष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में भी33 स्वर्ण, चार रजत प्राप्त कर चुकी हैं।
दीपा मलिक भारत की पहली महिला हैं जिन्हें हिमालय कार रैली में आमंत्रित किया गया।

2008,2009 में उन्होंने यमुना  में तैराकी व स्पेशल बाइक सवारी को लेकर लिम्का बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड में अपना नाम दर्ज कराया।

भाला फेंकने में भी एशियाई रिकॉर्ड में उनका नाम है और गोला तथा चक्का फेंकने में 2011 में विश्व चैंपियन में भी वे रजत पदक जीत चुकी हैं।

दीपा मलिक के जज्बे को सलाम उनके मेडल्स गिनने के लिए तो शायद गिनतियां कम पड़ जाए।
खेल के साथ-साथ वे सामाजिक कार्य भी करती हैं, लेखन भी करती हैं। गंभीर बीमारियों से पीड़ितों के लिए कैंपेन भी चलाती हैं। कई सामाजिक संस्थाओं के कार्यक्रम में में बढ़ चढ़कर हिस्सा लेती हैं।

दीपा मलिक के जीवन को देखकर लगता है कि विकलांगता शब्द के मायने ही उन्होंने बदल दिए हैं,
भारत के सर्वोच्च खेल सम्मान राजीव गांधी खेल रत्न अवॉर्ड उन्होंने अपने नाम किया है परिश्रम के कारण।

8 मार्च अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस की सभी को बहुत-बहुत शुभकामनाएं
और हम अपनी भारतीय महिलाओं से प्रेरणा लेते रहे और इसी तरह से देश का नाम रोशन करते रहे।


वंदना शर्मा🙏