मुश्किल नही है ,जिन्दगी का सफर "
कुछ अपने ही ,कहाँ छोडते है ,जीने लायक"
कमजोर कर देते है, जीने की जिजविषा को,म
निचोड,देते शब्दो मे बसे रस की परकाष्ठा"
क्या गलत करते है,हम"बस अपनापन,
ही तो बाँटते है,ताकि मिल सके हमे भी,सुकून,
नहीं आता ,हमे दोहरी जिंदगी जीना,,
न आता है ,दोगलापन,,,सब समझाते थे"
कुछ अर्से ,पहले की हम सब आपने है"
हमें अपना कर चलो,सफर आसान होगा"
हम विंमूढ से रख लेते उनकी लाज बिना तर्क"
पर समय घुटने ,कहाँ" टेकता है,कमजोर तो,
होते है हम,यकीनन पकड लेते है कमजोर रस्सी"
जो पहले से ही,गाँठ से भरी होती होती है"
और चरितार्थ कर देती है ,कबीर जी के दोहे को"
सवेंदनाऐं तो आज भी है ,सब मे,पर है सुशुप्त'
किसी कोने मे,उन्हैं जगाना होगा खुद से ,
और जीना होगा,खुद की जिन्दगी ,
हम जीऐगें ,तभी तो समझेगें ,
अन्तर्मन की पुकार"
और बनाऐगें एक लक्ष्य,जोडेगे एक सशक्त डोर,
जो कभी कमजोर न होगी ,रोक लेगी हर सैलाब""
✍️🏻मेरी कलम से"
रीमा महेन्द्र ठाकुर
रानापुर-झाबुआ -मध्यप्रदेश"भारत

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