बर्फ की सीली सा मेरा दिल।
ठंडे सारे अरमान हो गयें। 
जीने की नही बची कोई चाहत।
जज़्बात सारे भाप बन उड़ गये।

सकुन के पलों के लिए।
ठंडी आहे भरते है। 
नहीं चाहिए ये झंझावत। 
निरंतर साथ समय के बहते चलते है।

बर्फीली गुफाओं से बाहर निकल ।
मौसम की गरम हवाओं में। 
दिल दिमाग करते है तरोताज़ा। 
वक्त के तक़ाजे में। 

साधु सन्त बनकर इन।
गुफ़ाओ में नहीं बसना है।
गृहस्थ जीवन भी जरूरी है। 
जीवन के इस यापन में। 

नीलम गुप्ता 🌹🌹(नजरिया )🌹🌹
                दिल्ली