उड़ती हवा,बेहकी गगन
पुष्प भी जग में मुँस्काया
पर्वत सूर में गायीं तो
संगम जल भर आया
'कोयल' की कूँ-कूँ को सुनकर
मोरनी पंख हिलाया
मौसम की पल,उमड़ी तो
कुन्दन नभ भर आया
'भोर' का तारा,'शुक्र' भी चमका
'मंगल' लाल दिखाया
हरियाली सी 'पृथ्वी' हमारी
'चँद्रमा' रूप निखारा
मेरा देश जो 'भारत' ठहरा
कुद़रत भी जोत,जलाया
'हिमालय' जब,खरा हुआ तो
ओरों ने 'शिष' झुकाया
लेखक:-विकास कुमार लाभ
मधुबनी(बिहार)

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