साधना पर क्या लिखूँ! हम मनुष्यों के पास, इस जीवन की आपा धापी के अलावा और क्या साधना होगी!
जिस तरह ऋषि मुनि पहाड़ की गुफा कंदराओ में मोक्ष की प्राप्ति के लिए साधना करते हैं! वैसे ही हम लोग भी तो पूरे जीवन को साधना के रूप में ही जीते हैं!
जीवन के शुरुआत में जब हम पति पत्नी बनते हैं, माँ बाप की एक साधना सफल होती है! बच्चे को जन्म देकर फिर उसे लायक बना लें तो एक और साधना पूरी हुई!
अंत में जब बूढ़े होकर, अपने बच्चों को प्रेम और खुशी पूर्वक मेल जोल से रहते देखते हैं, अपने द्वारा कठिन साधना कर, बनाए हुए मकानों में आदर सम्मान के साथ रहते हैं तब जाकर असली साधना पूरी होती है और साधना का उचित फल प्राप्त हुआ, ऐसा लगता है!
पर नहीं, इस तरह का फल हर किसी को नहीं प्राप्त होता है, कितना भी कठिन साधना कर लें और बच्चे लायक ना बने, बुजुर्गों का आदर सम्मान ना हो, परिवार में प्रेम भाईचारा ना रहे तो हम किसलिए इतना कठिन साधना कर रहे हैं!
सभी इस गृहस्थ जीवन में उचित अनुचित का अवलोकन करते हुए साधना करते रहें, अच्छा फल अवश्य प्राप्त होगा!
साधना सफल होंगीं!
मुझे अपने स्तर से साधना का जो उचित परिभाषा लगा वही मैंने लिखा!
श्वेता कर्ण!

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