हम दोनों है रेल की पटरियों से
जो साथ चलती हुई भी
कभी मिल नहीं सकती
ग़र मिली तो क़यामत होगी
रीति रिवाज सामाजिक बंधन जिनके स्लीपर्स हैं
जिनसे बंध के चलना ही जीवन है
क्रॉस-ओवर जीवन में एक मोड़ ले आता है
जीने की गति धीमी कर
उसे थोड़ा बहुत बदल जाता है
पर हमारे बीच की दूरी तब भी वही रहनी है
सुख दुख हैं सिगनल जैसे
जो कभी चलने को कहते
कभी थमा देते कुछ पल को
पर ठहरना भी तो हिस्सा है जीवन का
किलोमीटर के खंभे
बस पड़ाव भर हैं
खुशी और गम के
जो आएंगे जाएंगे, और
जिनसे गुजरते रहना है ताउम्र
ओ.एच.ई के तारों में प्रवाहित करंट
साँसे हैं अपनी
और पूरी ट्रेन हैं हम
उतार-चढ़ाव तो कभी ठहराव
सब पार करते
तय करना है जीवन का सफर
पर.....
हम फिर भी नहीं मिल पाएंगे
क्योंकि....
हम दोनों है रेल की पटरियों से
जो साथ चलती हुई भी
कभी मिल नहीं सकती
ग़र मिली तो क़यामत होगी
---दीपक कुमार

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