प्रतिध्वनि मेरे ही शब्दों की ,
आकर मुझे बताती है।।
मत चीख एकांत भाव में
क्यों बिहल व्यथित तू होती है ।।
मन अधिर कर अपने ही मन में,
क्यों व्यर्थ द्रवित तू होती है ।।।।
दीवारें सब ऊंची ऊंची,
कौन सुने बातें दिल की
चांदी की परतों से ढक गई
दरारें भी अपने घर की ।।।
प्रतिध्वनि अपने ही शब्दों की ,
आकर मुझे बताती है।।।
अथाह सागर सी वेदना ह्रदय में ,
हिचकोलें खुशियां लेती हैं,
कुछ मोती पाकर ये मन ,
स्वपन लोक में गमन करे
मीनारों से ऊंचे प्रतिबंध ,
पैर जंजीर पड़ी हुई ।।।।।
प्रतिध्वनि मेरे ही शब्दों की ,
आकर मुझे समझती है।।।
श्रृष्टि रचियता आदि,अनंत है
प्रार्थना ना व्यर्थ जाएगी,
दृढ़ विश्वास,ईश्वरीय शक्ति का ,मूलमंत्र
ॐ कार् है !!!!
प्रतिध्वनि ॐ कार की ,
ब्रह्मांड समस्त मे व्याप्त है,
ॐ कार ही श्रृष्टि में ,
सत्य एक मात्र है !!!!!
कीर्ति चौरसिया
जबलपुर (मध्य प्रदेश)

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