मैं 
नारी तो हूं
पर वह श्रद्धा नहीं
जो नभ तल और थल में 
पीयूष धार बनकर
बह जाऊं
अनभिज्ञ नहीं हूं मैं
हां भान है मुझे 
अब पग पग पर
प्यासी है दुनिया 
हर एक पीयूष बिन्दु की
तलाश है उसे हर पल
इन नेत्रों में किसी प्यासे जलसिन्धु की
जिसकी सुगन्ध पा लेते थे कभी 
मेरे भीगे आंचल से वह
और कर देते थे तार तार
उसी आंचल को
मौका पाते ही
पर मैंने
वह आंचल ही मिटा दिया
और उन चुभती निगाहों पर
अपने कदमों को सटा दिया
उनको तो 
सिर्फ नारी हो
सिर्फ और सिर्फ नारी ही हो
नवजात 
किशोरी या फिर कोई नवयौवना
वृद्धा हो
पशु या पक्षी हो
बस नारी हो
नारी ही हो
जानते हो तुम उनको
और उनके अन्तस् को 
वह नर नहीं
नरपिशाच होते हैं
जो मानव रुप रखकर
दानवता का अभिशाप ढ़ोते हैं
मैं नारी हूं
गंगा की धारा सी निर्मल
संताप मिटाती 
जग के
जिसने भी मुझे 
जिस रूप में देखा
मैं वही रुप धरती
कहीं मां कहीं बहन
बेटी और संगिनी
इन सबसे पहले नारी हूं
यह शाश्वत सत्य 
क्यों भूल जाते हो
जानते हो क्यों भूल जाते हो
‌क्योंकि 
तब 
तुम नर नहीं 
नर पिशाच होते हो
मानव रूप में
दानवता का अभिशाप ढ़ोते हो
अब छोड़ो भी
यह ताना-बाना
रावण 
दुर्योधन 
दु:शासन का
केशव बन चक्र उठा लो अब
तब मैं भी
निर्मल हो
पीयूष स्रोत सी बह जाऊंगी
धरती को स्वर्ग बनाऊंगी
धरती को स्वर्ग बनाऊंगी।।
                      देवयानी भारद्वाज
                 उसायनी फीरोजाबाद