जीवन को व्यवस्थित
करने की चाह में,
तिनका, तिनका जुटाकर,
स्नेह ,उमंग,उत्साह
से द्विगुणित हो
बनाया घोंसला
खपरैल की छत पर
एक नन्हीं गौरैया ने।
नीड़ बनकर तैयार
उसके हर्ष का,
न परावार,
अचानक आई,
तेज आंधी
नीड़ को उसके
ले उड़ चली।
देखती अवाक,
हो हतप्रभ,
ईश ने किया क्यों।
ये छल।
किंतु संभल जाती
उसी क्षण
कुछ भी नहीं असाध्य,
जीवन तो शेष है.....
त्यागती नहीं,
निज स्वभाव ।
उन्हीं भावों को लेकर
अक्षुण्ण संकल्प
के साथ बनाती है ।
अन्यत्र कहीं
दूसरा आस का नीड़
जहां हो सके
उसके नन्हें मन की,
जिजीविषा का
दीप प्रज्वलित।
🌺स्नेह लता पाण्डेय🌺
नई दिल्ली

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