फागुन रंगों का मेला है
पर बाहर कोरोना फैला है
कैसे घर से बाहर जाए
और सबको रंग लगाए

मम्मी से रुठ के गुड़िया बोली
मैं खेलना चाहूं होली

लाल-गुलाबी,नीले-पीले,
कितने सारे रंग खरीदे
कैसे गालों पे गुलाल लगाए,
बिना चेहरे से मास्क हटाए

हम बच्चों की रंगीली टोली
मैं खेलना चाहूं होली

बीते बरस भी सबने रोका
रंग खेलने का मिला न मौका
इस बार भी यह डर क्यों सताए
जल्दी से कोरोना क्यों न जाए

उदास बिटिया पापा से बोली
मैं खेलना चाहूं होली

✍️प्रीति ताम्रकार 
      जबलपुर