ये वसुधा जरा इधर भी साफ कर दे "पूरे टेबल पर फैले कागज के टुकडे को नीचे फर्श पर गिराते हुऐ "बोले मित्तल 
साहब "जी साहब "वसुधा (वसुन्धरा) टेबल की ओर बढ़ गई मितल साहब "चश्मे के अन्दर से वसुधा को घूरे जा रहे थे। 
ऐसे जाने कितने वहशी लोगों को रोज   बर्दाश्त कर रही थी ,वसुधा" पर उसके पास और कोई चारा न था।
अभी उसकी, उम्र ही क्या थी । बाल विवाह हुआ था उसका,  उस वक्त उसकी उम्र 5 साल थी।
14 साल में उसका गौना हो गया। उसका पति मोहन पहले उससे बहुत लडता था। फिर धीरे-धीरे उसकी वह लड़ाई प्यार में बदल गई" 17 की होते होते 2 बच्चों की मां बन चुकी थी। जुड़वा बच्चे संभालना उसके लिए बहुत मुश्किल हो रहा था। बच्चों के कारण में मोहन अपने आप को उपेक्षित 
समझने लगा "   और वह वसुधा से दूर होने लगा। कुछ लोगों की गलत संगत में पड़कर वह नशे की लत में पड गया। शराब के नशे में गिरने के कारण उसे ब्रेन हेमरेज हो गया। उम्र के पहले ही काल के गाल में समा गया। छोड़ गया वसुधा और दो बच्चों कोअकेला निस्सहाय " मोहन के जाते सारे रिश्ते नाते उसे छोड़कर चलें गये।  वो पाँचवी पढी थी "कुछ पढ़ लिख लेती थी! उसके दूर के मामा ने सिफारिश कर सफाई कर्मचारी में उसकी नौकरी लगवा दी थी। समय ने उसकी हर स्थिति में परीक्षा ली " वो डट कर खड़ी रही डगमगाई नहीं" मित्तल साहब के रिटायर होने से नए साहब आ गये।   नये साहब "वसुधा को अपनी बहन मानते थे। वसुधा भी धीरे-धीरे उनसे बहुत घुल मिल गई"
नये साहब" वसुधा को बहुत सपोर्ट, करते थे!
"
वसुधा ने फिर से पढ़ाई चालू कर दी. उसकी मेहनत रंग लाई और उसने  दसवीं पास कर ली"  वसुधा को प्रमोशन मिल गया !और वो लाइब्रेरी का काम सम्भालने लग गई"
समय के साथ बच्चे बड़े हो गए, वसुधा की मेहनत रंग लाई उसके दोनों बच्चों का मेरिट लिस्ट में नाम आ 
गया। 
दोनों बच्चों ने भी अपनी मां के सपनों को पूरा किया। और पढ़ाई में जान लगा दी। एक बेटा कमिश्नर बन गया एक बेटा तहसीलदार के पद पर अधीनस्थ हो गया। फिर भी वसुधा ने नौकरी ना छोडी" समय के साथ दोनों बेटों की शादी हो गई"
और अब  वसुधा के रिटायर होने का दिन आ गया ।
सारा स्टाफ वसुधा की विदाई समारोह में शामिल हुआ। वसुधा की निगाहें मेन गेट पर ही लगी थी। उसकी आँखें बार बार भर रही थी। उसने अपने तीस साल दिऐ थे इस लायब्रेरी को "सजाया सँवारा था। तभी मेन गेट पर कई गडियो का कफिला आकर रुक गया। सबकी निगाहे मेनगेट 
पर टिक गयी। 
उसके दोनों बेटे माँ को लेने सीना तान कर चले आ रहे थे। 
उनके पीछे मीडिया की भीड थी। 
कैमरे के फ्लैश की रोशनी से सब की आँखे चुधिया रही थी। 
अगले दिन की अखबार की हेडलाईन , वसुधा का वसुन्धरा 
जन्म ,अब तक वसुंधरा जाने कितनो की प्रेरणा श्रोत ,बन चुकी थी।  समाप्त 


                        रीमा महेन्द्र ठाकुर                     
                        रानापुर झाबुआ मध्यप्रदेश