कैसे बताएं तुम कितना लाजबाब लगते हो,
हकीकत से भी जो  प्यारा वो ख्वाब लगते हो,

जिसे ढूंढती थी अक्सर  मैं ,तुम
मेरी वो तलाश लगते हो।

जिससे मिलकर मेरी हर तड़प में सुकून भर जाए,
तुम मेरे सवालों की वो किताब लगते हो।

कभी रूठते कभी मना लेते हो,
रफ्ता रफ्ता रूह में उतरता एहसास लगते हो।

जो हर सुबह से भी ज्यादा रोशन है,
तुम मुझे वो चाँदनी रात लगते हो।

अजब सी कसक होती तुझसे बिछड़कर,
दूर होकर भी दिल के आसपास लगते हो।

कैसे लिखूं शब्द ही नहीं मिलते,मुझे
बस मुझे हर जगह आप लगते हो।

अंजू दीक्षित,
बदायूँ, उत्तर प्रदेश।