आँखें नम जाती है,
    जब दर्द से "आँसू" निकलती है!
अंधेरों की डर से 'अंधों की
    नभ मोम सी झलकती है!
आँखें नम जाती.....


गिर जाता हूँ,लेकिन उठ नहीं पाता
    उस समय एक सहारा,सिर्फ माँ ही रहती है!
क्या कहूँ?,किससे कहूँ? 
    खुद का दर्द,मेरी आत्मा बयां करती है! 
आंखें नम जाती.....


मैं अकेला हूँ,बेसहारा हूँ
    मैं तो बस बहती,नदियों का एक किनारा हूँ!
बह जाऊँ तो,एक निर्मल धारा की
    एक "आँसू" दुख-दर्द बदलती है!
आँखें नम जाती.....


क्या करुँ,मैं इस 'तन' का
    जिसके लिए,पट्टी बाँधे संसार है!
बे-कसुर कहूँ,या बेबस इंसान
    जिनका सहारा,किसी ओरों से चलती है!
आँखें नम जाती.....




        लेखक:-विकास कुमार लाभ 
                       मधुबनी(बिहार)