ह्रिन्यकश्यप की एकलौती बहन थी होलिका, 
और दुश्मन थी प्रहलाद की...
भाई की हुकुमत के आगे,
खड़ी हुई बन ढ़ाल समझकर आग के...

प्रहलाद थे श्री हरि विष्णु के भक्त,
करते थे हरि नाम का जप...
ह्रिन्यकश्यप थे पिता 'प्रहलाद' के, 
अहंकार था उनका तन मन... 

प्रहलाद की भक्ति,पिता को रास नहीं आयी,
उनको फेक दिये,गहरी खाई में उठाकर...
फिर भी प्रहलाद बच निकले तो,
डाल दिये कारागार में उठकार...

सभा हुई तो होलिका भी आयी, 
बोली आग में लेकर,बैठ जयेंगे हम... 
आग की लपटी,मुझे छू नहीं सकता, 
जलने लगी अपनी ही आगों में...

फिर होलिका की अंत हुई तो,
खुशियों भर गाये टोली...
बुराई पर अच्छाई की जीत मिल, गयी फिर 
आयी प्यार की होली...




         लेखक:-विकास कुमार लाभ
                       मधुबनी(बिहार)