स्मृतियों के भोजपत्र से
शब्द चुराती रही जिन्दगी।
ऐसा बैसा अगर मगर कर
अर्थ दुराती रही जिन्दगी।।
जीवन की शीतल राहों को
नित दहकाती रही जिन्दगी।
एक आस विश्वास जगाकर
मन बहकाती रही जिन्दगी।।
सुख की शीतल अवराई में
जब इठलाती दिखी जिन्दगी।
दुख की काली छाया बनकर
उसे छलाती रही जिन्दगी ।।
तेरा मेरा करते करते
स्वप्न दिखाती रही जिन्दगी।
हँसते रोते पल पल छिन छिन
श्वांस चुराती रही जिन्दगी।।
देवयानी भारद्वाज

0 टिप्पणियाँ