"नारी हूँ मैं,
हर रूप में ढ़ल सकती हूँ।
कच्ची मिट्टी से बनी एक मूरत हूँ मैं।
माँ के रूप में ममता की आँचल बनकर,
बेटी के रूप में परी हूँ ।
पत्नी के रूप में अप्सरा बनकर,
बहू के रूप में लक्ष्मी हूँ ।
पिता के कुल की मर्यादा बनकर,
ससुराल की मान हूँ ।
भाई के कलाई राखी का धागा बनकर,
बहनों का अभिमान हूँ ।
मायके में फूलों की महक बनकर,
बेटी के रूप गुणों की खान हूँ ।
मायके में पाठशाला की विद्यार्थी बनकर,
ससुराल हर कदम इम्तिहान हूँ।
मायके में त्योहारों की शान बनकर,
ससुराल में कर्तव्य की मिसाल हूँ।
कठिनाइयों में हौसला बनकर,
जिंदगी के राह में संघर्ष हूँ।
चट्टान से टकरा जाऊँ हौसला बनकर,
मन से मज़बूत हूँ
शब्दों के तीर से बिखर जाऊँ आँसू बनकर,
कच्ची मिट्टी सी घड़ा हूँ।।"   

                                 अम्बिका झा ✍️