अंग अंग में रचा हुआ है ,
रंग रंग यू गोरी ...........।
रूप तुम्हारा सजा हुआ है ,
जैसे सजी रंगोली ..........।

आंखें नरगिस कलिका जैसी ,
छलकाती पैमाने.............।
अधरों से उड़ता पराग,
भंवरे तक हुए दीवाने..........।
गालों में छाई लाली ,
जैसे आई हो होली ..................।
रूप तुम्हारा सजा हुआ है.........

शर्मा कर झुकती पलकें,
जो झुक जाए आकाश..............।
बाकी चितवन से देखो तो ,
दहके प्राण पलाश.............।
काली-काली घूंघर अलकें,
मुखडे से करे ठिठोली.............।
रूप तुम्हारा सजा हुआ है .........

मुस्काती हो जब तुम,
छा जाए मधुमास................।
हंसती हो कणकण में ,
खिल खिल उठे गुलाब.............।
बोल तुम्हारे कूक उठी हो,
कोयल जैसे कोई भोली..............।
रूप तुम्हारा सजा हुआ है .............

फर फर फहराए चुन्नी,
इंद्रधनुष छा जाए ...............।
रंग-बिरंगे कुर्ते में ,
रूप तेरा लहराए.................।
लहर लहर लहराए , 
जैसे फागुन में गोरी...............।
रूप तुम्हारा सजा हुआहै..............

स्वर्गीय प्रेम शंकर पाण्डेय           
            गोरखपुर