जीवन की इन उलझनों में
चंद टुकड़ों की चाह में
बर्बाद ए इंसानियत हो गई
भाई भाई का न रहा 
पिता बेटा साथ न रहा
घर मे ममता घुटके मर गई
माँ आजकल के बेटों को तरस गई 
पत्नी पति है देना बैंक
बच्चे होगये इसमें हें क
उलझन है परिवारो की
ना मिलते विचारों की
नए पुराने के चक्कर में
मध्यम पीढ़ी वालो की
एक साथ हो सबके हाथ हो
कमी ना हो संस्कारो की
घर मे ही सुलझेगे उलझन
भीख ना मिले बाज़ारों की
मिलना झुकना थोड़ा थोड़ा
नाक ना रखना तारों की 


         संध्या पंवार 
           राजस्थान