कहां विवश थे
शिव
वह तो करुणा थी उनके हृदय में
दया थी 
प्रेम की पराकाष्ठा थी
सामर्थ्य थी उनमें
गरल को धारण करने की
समष्टि की रक्षा हेतु
रक्षा की
और कहलाये
देवों के देव महादेव
अचला भी कहां विवश है
बोझ उठाने को 
प्राणियों का
जगती की रक्षा के लिए
जन जन के पोषण के लिए
सक्षम है वह भी
उसके हृदय में भी प्रेम का सागर 
हिलोरें लेता रहता है
तभी तो
अपने सीने को चीर वह भी
उगलती है फसलें
तब कहलाती है 
ममतामयि मां धरित्री
कहां विवश हूं मैं भी
प्रेम करने तुमसे
किसने विवश किया था मुझे
तुम्हें कोख में रखने के लिए
जिंदगी को दांव पर लगा
तुम्हें दुनिया में लाने के लिए
अपने ही लहू से पोषित करने के लिए
वह केवल प्रेम ही तो था मेरा
जिसने मुझे नारी बनाया
फिर किसी भी रुप में देखा हो तुमने
पर मेरे हर स्पर्श में
तुम्हें मेरी करुणा
मेरी ममता और प्रेम का ही 
स्पर्श हुआ 
सच है न
फिर मेरे साथ यह अन्याय क्यों ?

                                    देवयानी भारद्वाज