पात्र 1 - किशोर (उम्र 14 - 15 साल)
पात्र 2 - लड़का (उम्र 13 - 14 साल )
महिला 1
महिला 2
महिला 3
महिला 4
मंच पर अंधकार है । नेपथ्य से एक पुरानी फिल्म का गीत उभरना शुरू होता है ।
हम मेहनतकश, इस दुनिया से जब अपना हिस्सा मांगेंगे एक बाग नहीं, एक खेत नहीं, हम सारी दुनिया मांगेंगे
धीरे-धीरे मंच पर प्रकाश फैलना प्रारंभ होता है ।
एक किशोर, जिसका चेहरा मलिन, सूखे होंठ, खिचड़ी बाल, फटी पतलून और फटी कमीज़ पहने हुए है, अपने सिर पर झाड़ू का एक गट्ठर लिए मंच पर आता है ।
मंच पर एक गली का दृश्य है जिसमें बहुत से बंद दरवाजे
हैं । किशोर एक दरवाजे पर रुक कर आवाज लगाता है ।
किशोर : झाड़ू ले लो, झाड़ू ले लो ।
कोई हलचल ना देख, वह अपना पूरा दम लगा कर बहुत जोर से आवाज लगाता है ।
किशोर : झाड़ू ले लो, झाड़ू ले लो
एक दरवाजा खुलता है । एक महिला बाहर निकल कर कहती है ।
महिला 1 : झाड़ू वाले, झाड़ू कितने की कितने की है ?
किशोर के चेहरे पर हल्की मुस्कान आती है । वह अपने सिर से गट्ठर उतार नीचे रखता है । महिला को एक झाड़ू निकाल कर देता है ।
किशोर : साठ रुपए की है ।
महिला 1 : साठ रुपए की झाड़ू ? यह तो बहुत महंगी है ।
मंच पर दूसरे दरवाजे भी खुलते हैं और तीन महिलाएं अपने अपने दरवाजे से बाहर आ किशोर के पास जाती है । सभी महिलाएं झाड़ू उठा-उठा कर देखती हैं ।
महिला 2 : पचास रुपए की देनी है तो दे दो । हम सब एक-एक ले लेंगे ।
किशोर : नहीं अम्मा, पचपन रुपए तो मेरी खरीद ही है मैं पचास में कैसे दे सकता हूं ? आप कहीं से भी पता कर लो आपको इससे महंगी ही मिलेगी ।
महिला 3 : हां हां, हमें ना सिखा । देनी है तो पचास में दे, नहीं तो आगे बढ़ ।
किशोर : मैं नुकसान में कैसे बेच दूं । घर का खर्च चलाना
है । मेरी मां बीमार है । बहन को भी पढ़ाना है ।
महिला 4 : क्यों तेरा बाप नहीं कमाता या सारी कमाई पीने में उड़ा देता है ।
किशोर : जी मेरे बापू नहीं रहे ।
महिला 1 : यह कहानी हमें ना सुना ।
किशोर : मैं बस एक झाड़ू पर पांच रुपए ही कमा रहा हूं अगर यह भी नहीं लूंगा तो मेरा परिवार कैसे पलेगा ।
सभी महिलाएं मुंह बनाती हुई अपने-अपने दरवाजे से अंदर चली जाती है
मंच पर किशोर अकेला रह जाता है वह आंखों में आंसू लिए अपना सामान समेटने लगता है ।
दृश्य 2
मंच पर एक लड़का शनि महाराज कहता हुआ प्रवेश करता है । उसके हाथ में एक डिब्बा है, जिसमें एक तस्वीर रखी हुई है । डिब्बे में थोड़ा सा सरसों का तेल और कुछ सिक्के पड़े हैं । उसने गेरूवे रंग के कपड़े पहने हैं । चेहरे पर तिलक लगाया हुआ है । वह बंद दरवाजे के सामने खड़ा हो आवाज लगाता है ।
लड़का : शनि महाराज, शनि महाराज ।
आवाज सुनते ही सभी महिलाएं अपने-अपने दरवाजे खोल देती हैं । सभी के एक हाथ में तेल से भरी कटोरी और दूसरे हाथ में पैसे हैं । वे सभी बारी-बारी से प्रसन्न भाव से लड़के के डिब्बे में तेल और पैसे डालती हैं और तस्वीर को छूकर हाथ सिर से लगाती है । लड़का मंच से चला जाता है ।
मंच पर किशोर झाड़ू का गट्ठर बना चुका है । वह यह सब देखकर अपने बहते आंसुओं को साफ करते हुए दर्शकों से कहता है ।
किशोर : आज इन लोगों ने मुझे सिखाया है, मेहनत करना गलत है और भीख मांगना सही है ।
महिला 1 : अरे क्या कह रहा है, जरा मुंह संभाल कर बोल ।
किशोर : अम्मा मुझ मेहनत करने वाले को पांच रुपए देना महंगा लग रहा है और जो भीख मांग रहा है, उसे आप प्रसन्न होकर पैसे दे रही हैं ।
महिला 2 : अरे वह भीख नहीं मांग रहा । हमने तो शनि महाराज को तेल और पैसे चढ़ाएं हैं ।
किशोर दर्शकों से मुखातिब होता है ।
किशोर : लोगों की ऐसी सोच की वजह से ही भीख मांगने वाले बढ़ते हैं और हम मेहनत करने वाले एक-एक पैसे को तरसते हैं ।
सभी महिलाएं बड़बड़ाती हुई दरवाजों से अंदर चली जाती हैं और दरवाजा बंद कर देती हैं ।
मंच पर किशोर अकेला रह जाता है । वह सिर पर झाड़ू का गट्ठर उठाएं दर्शकों की ओर देख कर कहता है ।
किशोर : आज से एक भिखारी और बढ़ गया । अगले शनिवार मैं भी हाथ में एक डिब्बा लिए आऊंगा और हर दरवाजे पर ऐसे ही शनि महाराज की आवाज लगाऊंगा । तब मुझे भी ऐसे ही प्रसन्न भाव से तेल और पैसा मिलेगा ।
मंच पर धीरे-धीरे अंधेरा छाने लगता है । नेपथ्य से एक आवाज आती है ।
और इस तरह उसका मेहनत करने का वह आखिरी दिन था, भीख मांगने वालों की कतार में अब वह भी खड़ा था ।
समाप्त
धनु दयाल

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