सांवली ओ सांवली उठ जा सुबह के पाँच बज चुके हैं।
जल्दी से नहा कर भोले नाथ के मंदिर से पूजा करके आ जा। आज महाशिवरात्रि है तो मंदिर में भीड़ जमा हो जाएगी।
सांवली आँख मलते हुए उठ कर बैठ जाती है।
हाँ माँ अभी जाकर नहा कर पूजा करके आती हूँ।। सांवली बचपन से शिव की अनन्य भक्त है सुबह उठकर सबसे पहले स्नान कर शिव आराधना करती है फिर कोई अन्य कार्य।

आज सांवली को देखने लड़के वाले आने वाले हैं। क्योंकि सांवली शिवभक्त है तो उसके माता-पिता शिवरात्रि के दिन ही लड़के वाले को अपने यहां आने के लिए कहते हैं।
लड़के के माता-पिता भी शिव भक्त है। जब उन्होंने सांवली के शिव भक्त होने की बात सुनी तो फौरन रिश्ते के लिए हां कह दिया।
सांवली स्नान कर मंदिर जाकर शिव आराधना कर घर कार्य में माँ का हाथ बंटाने लगी।
कुछ ही समय बाद लड़के वाले आ गए।
जिनके लिए सांवली ने पहले से बैठक में सारी व्यवस्था कर दी है।
एक कोने में टेवल पर उसकी खुद से बनाईं
टेबल क्लॉथ पे सजा ताज़े फूलों का गुलदस्ता बना कर सजा दिया था।
दूसरी ओर सोफे के दोनों तरफ फूल दान लगाकर सजा रखा है।।
सांवली के पिता राघवेन्द्र जी अपने होने वाले समधी सुमेर प्रताप उनकी पत्नी श्रीमती सुनैना और पुत्र गौतम के हाथ जोड़ कर सम्मान सहित बैठक में बिठाते हैं।
लड़की अपनी माँ के साथ उनके लिए चाय नाश्ते के साथ आती है। और नाश्ते की प्लेट टेवल पर रखकर हाथ जोड़कर प्रणाम करती है और सब को चाय देती है।
सांवली के सांवले रंग को देख कर लडके को सांवली बिल्कुल पसंद नहीं आती है।
पर राजेंद्र प्रताप और सुनैना को सांवली के कार्य करने का ढ़ंग बोलने की शैली और उसकी सादगी को देख उन्हें बहुत ही पसंद आती है और वो लोग सांवली की बहुत तारीफ करते हैं। उन्हें तारीफ करते देख गौतम चूप रह जाता है। और वो लोग रिश्ता पक्का करके चले जाते हैं।
कुछ ही दिनों में दोनों का विवाह शिव पार्वती के आशीर्वाद से सम्पन्न हो जाती है।
ससुराल पहुंच कर सांवली अपनी सेवा भाव और निश्छल विचारों द्वारा सब का मन मोह लेती है।
ससुराल में सास-ससुर के आलावा उसके देवर जेठ और जेठानी भी उसे बहुत मानते हैं और स्नेह और सम्मान देते हैं।
पर अपने पति की स्नेह से वंचित रहती है।।
इसलिए शिव आराधना में कुछ ज्यादा ही मन लगाती है और शिव से प्रार्थना करती है उसके पति के मन में बस थोड़ा सा प्रेम जगा दो।
परिवार में सबकी चहेती बन गई थी।
घर के प्रति सांवली के समर्पण भाव को देखते हुए गौतम के मन में सांवली के लिए सम्मान बढ गया था। और उसके बर्ताव में भी काफी परिवर्तन हुआ था। अब सावली के किसी बात से वह चिढ़ता नहीं था ना दूर भागने की कोशिश करता था।
सांवली अपने सांवले रंग को लेकर कभी भी अपने मन में कोई भी गलत विचार आने ही नहीं देती थी। और अपने कर्म के प्रभाव से सबके मन में अपने लिए अलग ही पहचान बना लेती है।
अगले साल महाशिवरात्रि के समय सांवली के सास ससुर गंगा स्नान करने जाने लगते हैं तभी अपने परिवार वालों से पूछते हैं किसे क्या चाहिए।
बड़ी बहू ने शिव नाम लिखा हुआ सोने की चैन की मांग की और बेटों ने कहा "ओम नमः शिवाय" लिखा हुआ सोने की अंगूठी चाहिए।
सब लोग से पूछने के बाद सास सांवली से पूछती है तुम को क्या चाहिए।
सांवली कहती है शिवजी को पता है मुझे क्या चाहिए फिर भी गंगा जी में स्नान करने के बाद सबसे पहले जिस चीज पर भी आपकी दृष्टि पडे वही मेरे लिए शिव का आशीर्वाद समझ कर ले आइएगा।।

गंगा स्नान करने के बाद जब उन दोनों ने सामने देखा तो दोनों की पहली दृष्टि फूल हार के दुकान में मोगरे के गजरे पर पड़ी।
राघवेंद्र जी ने कहा। फूल का गजरा तो यहाँ से जाते जाते ही मुरझा जायेगा यह बहू के किस काम आएंगा। चलो कुछ और खरीद लेते हैं।
पर सास सुनैना ने कहा बहू ने कहा था जिस चीज पर पहली दृष्टि पड़े वही लेकर आने के लिए तो हम गजरा ही लेकर चलेंगे उसके लिए। आगे महादेव की इच्छा।
सबके लिए सब कुछ खरीद कर शिव आराधना कर दोनों को घर आते आते हफ्तों लग गए।
घर पहुंच कर जब सब को प्रसाद के साथ सबके लिए लाए गए उपहार देने लगे तो।
सांवली के लिए लाए गजरे को सासू माँ पोटली से बाहर ही नहीं निकाल पा रही थी। मन ही मन सोच रही थी। सब के चमकते उपहार के सामने अगर बहू को मुरझाए हुआ गजरा देगी तो बहू को बुरा लगेगा।
तभी सांवली बच्चों की तरह हठ करने लगी सासू माँ आपने मेरे लिए क्या लाया है? शिवजी ने मेरे लिए क्या भेजा है! मुझे  देखने की बहुत ही उत्सुकता हो रही है जल्दी से मुझे दे दो।
सासू माँ ने कहा इस पोटली में है जा कमरे के अंदर जा कर देख ले।
सांवली कमरे में जाकर जैसे ही पोटली खोल कर देखती है। बहुत ही सुन्दर सुगंधित  मोगरे के गजरे
अलौकिक किरण से जगमगाती रोशनी से परिपूर्ण मनभावन गजरा देखते ही झट से निकाल कर शिवजी के चरणों में समर्पित कर बालों में लगा लेती है। और सासू मां को धन्यवाद कहने के लिए बाहर निकल कर सासू माँ को ढूंढने लगती है जो अपने कमरे में उदास बैठी है यह सोचते हुए की बहू मुरझाए गजरे को देखते ही बहुत दुखी हुई होगी।
पर सासू माँ, सासू माँ के चहकते शब्दों को सुनकर वो जैसे ही सामने देखती है बहू के बालों में लगाएं गजरे पर नजर पड़ी तो गजरे के तेज़ पर नजर ठहर ही नहीं पा रही थी। और आँखे छलक आई।
सांवली बार बार सासू माँ को इतने सुन्दर गजरे के लिए धन्यवाद कर रही थी। पर सुनैना तो एकटक गजरे को निहार रही थी।उसे तो विश्वास ही नहीं हो रहा था कि ये वही गजरा है जो वह लेकर आईं हैं।पर शिव की महिमा को जानती थी और अपनी बहू के भक्ति मय भाव को भी।
जब गौतम घर आया तो सांवली को देखते ही रह गया उसके मन में प्रेम भाव जागृत हो गए। गजरे से निकलती सुगंध जैसे गौतम को सांवली की और खीच रहा था। और जो झिझक सांवली और गौतम के बीच में थी महादेव की कृपा से दूर हो चुकी थी।।
            ‌           अम्बिका झा ✍️