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मन
अनंत संभावना...
असीम विभावना....
कभी शरीर तक सीमित
तो कभी विचार असीमित
कभी शरीर- मन के पार
कभी आत्म ज्ञान का है आधार
कभी अपूर्व शक्तियों का है भंडार
मन कभी तो चेतना है
मन कभी अचेतना है
मन कभी अवचेतना है
मन के पार्श्व संचेतना है
ह्रदय और बुद्धि से परे
मनअस्तित्व की परिपूर्णता
मन ब्रम्हांड की सर्जन ऊर्जा
इस असीम संभावना को
क्यूं भावना और विचार से करना मन पर मैल ?
क्यूं अविचार और अज्ञान
से करना मन पर मैल ?
ध्यान की गहराई से
दृष्टा की दृष्टि से
जाग्रति की स्थिति से
प्रेम, मैत्रीऔर करुणा से
सत्य,सेवा और गुरुभक्ति से
मिल जाता है परम सुख और चैन
ऐसे दूर हो सकता मन का मैल।
_____________________ रचनाकार - मीनाक्षी कुमावत'मीरा'
रोहिड़ा (पिंडवाड़ा)
माउन्ट आबू,राजस्थान

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