छुपा कर सच मुझे बातें बनाना भी नहीं आया
जमाने को मुझे ये सब बताना भी नहीं आया।
अगर मैं जानती तो बेगुनाही सिद्ध कर देती
मुझे अपनी ही गलती को छुपाना भी नहीं आया।
नहीं मालूम था मुझको वो रूठेगा मेरे से यों
जिसे चाहा था शिद्दत से मनाना भी नहीं आया।
किया रुसवा उसे पाने की चाहत में उसे ही तो
मुझे खामोश रह कर कुछ सुनाना भी नहीं आया।
खड़ी हूँ वंदिता' मैं राह में अब भी दीवानों सी
गया जो दूर है प्रियतम, बुलाना भी नहीं आया।
विजयश्री 'वंदिता'

2 टिप्पणियाँ
आपकी रचना बहुत गहराई को छूती है