दुर्बल नहीं हूं मैं ,कमजोर नहीं हूं मैं 
विद्रोह करती हूं ,प्रतिकार करती हूं ,
नारी पर उठने वाली हर आंख को धिक्ककर करती हूं ।
हे अस्तित्व नारी का भी ,ये ऐलान करती हूं !!

गगन छू कर बता देती हूं 
दुनिया के फसाने को ।
अब पहचान अपनी भी बनाना आ गया मुझको।।
मर्यादा में रहकर भी तिरस्कार सहती थी,
जो न समझे थे ,उनको भी समझना आ गया मुझको ,
कोई सीता नहीं मै, कोई मीरा नहीं हूं मै,
जो जहर पी जाए, कोई रावण ही के जाए ,
विद्रोह करती हूं , प्रतिकार करती हूं 
हे अस्तित्व नारी का, ये ऐलान करती हूं !!!

रातों में सहम कर घरों में रुक गई थी मै,
ज़ख्म दुनिया के लेकर भी जहर को पी रही थी मैं,
जाने कितने जुल्मों को चुपचाप झेला था,
दहेज की आग में जल कर भी कुछ ना बोला तब,
वो बीता जमाना था ,मगर अब हो नहीं सकता,
कोई दामन को मेरे यूं अब छू नहीं सकता !!!

लगाकर दौड़ मैदानों में लहराती मै परचम हूं, 
लगाकर मै निशाना अब तीरंदाज बनती हूं ,
सुरक्षा देश की करने मै सरहद भी जाती हूं,
खड़ी हूं साथ पुरुषों के , नहीं पीछे हटी हूं मै,

बनकर मां भी ममता को दिलों में यूं संजोया है,
पत्नी का फरज भी हमने बखूबी निभाया है,
छोड़कर बाबुल का आंगन ,सा गई थी मै ,
करके प्रेम की बाते पिया को भा गई थी मै ,
जो परिवार उसका था ,परिवार मेरा है ,
जो मान देता है , सम्मान करती हूं ,
जो तिरस्कार करता है , अस्वीकार करती हूं ,!!!

*पंक्तियां मेरी कवियत्री सखियों को समर्पित*

कलम मेरी भी तेजी से चलने लगी अब ,
बनाकर तीर शब्दों को निशाना साधते हु अब ,
आंखों में नमी लेकर स्याही मे मै ढलती हूं,
कांटे कितने भी हों राह में लेकिन मै चलती हूं ,
कागज पर बना लेती हूं अब अपना घरोंदा मैं ,
सजाकर खुद को शब्दों से श्रंगार करती हूं ,

अब निर्बल नहीं हूं मै , कमजोर नहीं हूं मै ,
विद्रोह करती हूं , प्रतिकार करती हूं 
हे अस्तित्व नारी का भी ये ऐलान करती हूं !!!
            

    कीर्ति चौरसिया 
जबलपुर( मध्य प्रदेश)