पर जमीनी हकीकत की भी सुध जरूर थामे रखना ।।
ऊंचा और ऊंचा और ऊंचाई पर परिंदे भी जा उड़ते
थक हार कर आखिर वो भी तो अपने बसेरे की ओर ही आते।।
ऊंचाई पर जाकर क्या ? फिर भी इंसान संतुष्ट हो पाता असंतुष्टि के भाव लिए वो एक और कदम है फिर से बढ़ाता ।।
ऊंचाई की हद पाकर बौरा मत जाना, मुकाम संभाले रखना
पर वहां से धरती के लोगों को बौना भी कभी मत समझना ।।
शिखर पर काबिल कभी कोई और, कभी तुम कभी हम
पर सब एक से ही तो होते धरती पर हम तुम ।।
नहीं होता ऊंचाई के सिंहासन का कोई एक ही हकदार
बदलते रहते हैं अलग-अलग हां जी हां इनके दावेदार।।
राजेश्वरी ठाकुर
छत्तीसगढ़

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