अंधविश्वास से लदे, धर्म और जाति के भेद में उलझे, परंपरागत कर्मकांड में जकड़े रूढ़िवादी समाज के लिए, गुरु रविदास जी के दोहे उपचार के समान हैं ।

एक ही परमात्मा की संतान होने के नाते जन्म से सभी मनुष्य समान हैं ।
इक जोति ते जऊ सभ उपजै, तऊ ऊंच नीच कस मान 'रविदास' नाम कत धरै कहुं को, नाद बिंद है समान ।।

नाद बिंद- शब्द धुन

गुण ही सर्वोपरि है ।
'रविदास' ब्राह्मन मत पूजिए, जऊ होवे गुनहीन
पूजहि चरन चंडाल के, जऊ होवै गुन परवीन ।।

बाहरी कर्मकांड का विरोध करते हुए कहते हैं
देता रहे हज्जार बरस, मुल्ला चाहे अजान 
'रविदास' खुदा नहं मिल सकइ, जौ लौं मन शैतान ।। 

माथै तिलक हाथ जप माला, जग ठगने कूं स्वांग बनाया 
मारग छांड़ि कुमारग डहकै, सांची प्रीत बिनु राम न पाया ।।

ध्यान और नाम ही मन को शांत करने तथा इसे पवित्र बनाने का सर्वोत्तम साधन है ।
'रविदास' मदुरा का पीजियै , जौ चढ़ै - चढ़ै उतराय 
नांव महारस पीजियै, जौ चढ़ै नांहि उतराय ।।

बहिर्मुखी साधनों की व्यर्थता, मनुष्य का शरीर ही हरि मंदिर है ।
बाहर खोजत का फिरइ, घर भीतर ही खोज ।
'रविदास' उनमनि साधकर, देखहु पिआ कूं ओज ।।

उनमनि साधकर- ध्यान द्वारा मन को अंदर मोड़ कर
ओज- तेज, प्रकाश

राघो क्रिस्न करीम हरि, राम रहीम खुदाय ।
'रविदास' मोरे मन बसहिं, कहुं खोज बन जाय ।।

मन चंगा तो कठौती में गंगा ।।


                  धनु दयाल