एक प्यासी नदी
जो
हिमालय से गिरती
मैदानों से होती
वन वन भटकती
जगती की प्यास मिटाती
उछलती कूदती फांदती
एक अल्हड़ नायिका सी
अपनी रेशमी घुंघराली अलकों तले
दुग्ध धवल आंचल में छुपा
किसी की मीठी मीठी यादों को
बढ़ती जाती है
निरन्तर
किसी अजनबी की तलाश में
जो
सिसकती रहती है
निरन्तर
उस बाती की तरह
जोअंधेरों को चीरती हुई
दूसरों की राहों को रोशन करती रही
पर स्वयं अंधेरों से डरती हुई
न तो कभी पूरी पूरी जल ही सकी
और न ही
बुझने की संतुष्टि ही पा सकी
बिखरती रही निरन्तर
चांदी सी जो
लहरों पर
कछारों पर
सागर तट फैली सिकता पर
दरख्तों और पहाड़ों पर
आहों की गर्माहट का आभास कराती
तो कभी
नवेली दुल्हन किरण के शीश की
सुनहरी चूनर की तरह
मिलन की शीतलता से सराबोर
नीले चंदोबे तले
अलसी के कलशों सी इतराती
दिन के उजले आंगन में
चटकती कलियों के मखमली गलीचों पर
तितली सी इठलाती
हवाओं की आहट से छुईमुई सी सकुचाती
बढ़ती रहती है निरन्तर
मन्थर मन्थर गति से
किसी चिरंतन प्रेमी की ओर
जीवन की आड़ी टेड़ी राहों पर
झंझा द्वारा झकोरे जाने पर भी
वह
बिना किसी प्रतिकार के
बढ़ती रहती है
निरन्तर
जीवनदायिनी सी
क्योंकि वह नारी जो है
ग़म ही जिसका भोजन
और पानी
आंसू हैं
और देती है जीवन का अमृत
वह नारी नहीं तो ............?
देवयानी भारद्वाज

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