होली के दो दिन पहले 
श्रीमतीजी पतिदेव से बोली
पहले बहुत खेलते थे तुम
पर अब बंद मनाना होली

मैडम जी की बात सुनके
हुये पतिदेव हैरान
क्यों न खेलूं होली मैं
है यह कैसा फरमान

श्रीमती जी तो बस शुरू हो गई
लगी होली की बुराई गिनाने
होलिकादहन में लकड़ी फूंकते हो
क्या जंगल नही बचाने

होली के दिन तुम मजे से
रंग पुतवाकर आओगे घटिया
घोल के रंग पानी फेंकोगे,सोचो
जलसंकट झेल रही दुनिया 

इतना ही नही,फिर रंग छुड़ाने
दो घण्टे तक नहाओगे
और अगर हो गई स्किन की एलर्जी
तो डॉक्टर के चक्कर लगाओगे

और यह भी सोचोअपने घर में 
पेंट कराया कितना महंगा
होली के पक्के रंग कर देंगे
दीवार और फ्लोर को गन्दा

जब श्रीमती जी चुप हुई
तो पतिदेव जी ने पास बिठाया
एक गिलास पानी पिलाक़े
बड़े प्यार से यह समझाया

देखो श्रीमती जी प्यारी 
ध्यान से सुन लो बात हमारी
त्यौहार तो हैं मिलने जुलने के बहाने
ये मौके नहीं चाहिए गंवाने

और रही बात होलिकादहन की
तो एरण्ड,गुलेर की जो लकड़ी जलाते
हवा शुद्ध तो होती इससे 
साथ ही कीटाणु भी मर जाते

दूसरी बात होली पर अब तो
सभी लोग बस गुलाल लगाते
स्किन की एलर्जी न हो 
इसलिए सब हर्बल रंग ही लाते

और आजकल कोई भी
नही चाहता फेंकना पानी
कोई नही खेलता गीली होली
पब्लिक हो गई है सयानी

क्या नही चाहती अपने घर में
हम हर रंग जियें जीवन के
दीवारें वॉशेबल हैं,धुल जाएंगी
क्यूं न प्यार से रंग लें कोने मन के

पतिदेव की बात को सुनके
श्रीमती जी ने बदल दिया सब प्लान
(और मुस्काकर बोली)
बैठे क्या हो, चलो करें तैयारी
मनाएंगे होली, बहुत हैं काम

जला के अच्छाई की अग्नि 
हम बुराइयों को जलाएंगे
रंगों के त्यौहार में
हम भी खुशियां मनाएंगे

   ✍️प्रीति ताम्रकार 
         जबलपुर