होली के दसवें दिन घर घर विराजती है दशा माता,भारत मे ये वृत हर्षोउल्लास के साथ मनाया जाता है,,
अब ये दशा माता का पूजन भारत के अधिकतर राज्यो मे
बहुत ही उत्साह से मनाया जाता है,भक्तो की आस्था का प्रतीक,ये वृत बहुत ही श्रद्धा से मनाया जाता है,
सुबह ही नारियाँ पूजन की थाली के साथ दशा माता को अपने घर लाने के लिऐ निकल पडती है,।
भक्तो की आस्था से जुडा पर्व ,उनके मन की भक्ति और दशा माता का विश्वास उनके मन मे भाव पैदा करता है ,दशा माता उनके घर आयेगी,तो उनकी स्थिति सुधर जायेगी-जय दशा माता"🙏

प्रचीन समय की बात है,एक थे राजा नल ,जो अपने प्रजा का पालन अपने पुत्रो जैसा करते थे, उनकी रानी थी दमयंती  सदगुणी सुशील संस्कारी  और पतिवृता धर्म का पालन करने वाली"एक बार वो वन मे विहार करने निकली तो देखती है,की  बहुत सारी सौभाग्यवती स्त्रियाँ पीपल के वृक्ष के नीचे बैठ कर पूजन कर रही है"।
वो उत्सुकतावश वहाँ चली गई,और उनसे पूछा आप किसकी पूजा कर रही हो,तो एक स्त्री बोली हम दशा माता का पूजन कर रहे है,बहन तुम भी कर लो,दशा माता सारे कष्ट हर लेती है!और घर भी  हमेशा ,धन धान्यपूर्ण रहता है!
आज संयोग से रानी ने कुछ नही खाया था!तो उन्हौने वृत रख लिया,कच्चे डोरे मे दस गाँठ लगाकर"गले मे धारण कर लिया"और दस बार परिक्रमा कर धागे को पीपल से 
बाँध दिया,।
रानी विधि विधान से पूजा कर महल वापस आ गई"जब राजा नल कक्ष मे आये तो उनकी नजर रानी के गले मे धारण किये ,धागे पर पडी,उन्हौने पूछा ,तो रानी ने सुबह की सारी घटना बता दी,,सुनकर राजा को बहुत क्रोध आया,और राजा ने रानी के गलेसे,तोडकर धागा भूमि 
पर फेंक दिया !
और बोला मे ये सब नही मानता,राजा के आगे रानी की एक न चली, कुछ दिनो बाद  ही महल मे अकाल पड गया!मौके का फायदा उठाते हुऐ,दुश्मनों ने राज्य हडप लिया!
राजा को आत्मरक्षा के लिये ,महल से चुपचाप भागना पडा,राजा अब भेष बदल कर अपने परिवार के साथ,
भटकने लगा ,बच्चे भूखे प्यासे बिलखने लगे,
राजा छुपते छुपाते अपनी बहन के घर पहुँचा बहन ने उनका हुलिया देखा तो पहचानने से इन्कार कर दिया। 
राजा को बहुत दुःख हुआ,वो सराय मे आकर उदास बैठा था! पीछे से चुपके से बहन मिलने आयी,!
कुछ रोटी और प्याज साथ मे लायी,जिसे खाकर राजा और बच्चो मे कुछ जान आयी,!
बहन ने क्षमा माँगी ,और न पहचानने का कारण बताया "
की मेरी ससुराल वाले आपको इस हालत मे देखते तो ताना मार मार कर हमे मार देते,बहन रोती हुई अपने महल वापस चली गई, दूसरे दिन राजा अपने मित्र के घर पहुँचा ,मित्र ने बहुत स्वागत किया,राजा ने सोचा की अब वो यही रह जाऐगा,और मित्र के कार्य मे मदद करेगा"
राजा कक्ष मे लेटा था। की अचानक से राजा की नजर खूँटी पर टँगे मोतियो के हार पर पडी,
खूँटी हार निगल रही थी!राजा घबरा गया,और  रानी को जगाया,और पूरी घटना बतायी,,,,
सुबह जब मित्र की पत्नी आयी तो ,खूँटी पर हार नही दिखाई दिया वो चीखने चिल्लाने लगी ,राजा ने समझाने की कोशिश की,पर वो न मानी,राजा ने बोला मै ,दूसरे राज्य जाकर र्धन कमाऊँगा तो कीमत दे दूगाँ,
मित्र की पत्नी न मानी "लाचार होकर राजा को राजकुमारो को वही बंधक के रूप मे छोडना पडा,
अब तक रानी समझ चुकी थी'दशा माता के रूष्ट होने के कारण उन्हैं ये दिन देखना पड रहा है।
अब दोनो ने निर्णय किया की रानी के घर जाऐगे,और वहाँ किसी को नही बताऐगे की वो कौन है, रानी अपने मायके पहुँची,और घूघट निकाल लिया,और दासी बनकर रहने लगी"और राजा ससुराल के एक गाँव मे किसान के नौकर बनकर ,धीरे धीरे समय बीतने लगा ,किसी को कुछ न पता चला,होली आ गई ,,दासी बनी रानी ,राजमाता को ऊबटन लगा रही थी"की अचानक से छिपकली आकर गिरी,रानी के मुहँ से चीख निकल गई,और उनका घूघँट भी खुल गया!
राजमाता की नजर दासी पर पडी तो वो चौक गई,और रानी को गले लगाकर रोने लगी,,रानी ने माँ को सारा हाल सुना दिया,होली के दिन दमाद को महल मे बुला लिया । उसके बाद सबने दशा माता की पूजा का संकल्प लिया!
होली के दशवें दिन सबने दशा माता की पूजा धूमधाम से की,ममतामयी माँ प्रसन्न हो गई,और सबको क्षमा कर,अशीर्वाद देने खुद चली आयी"देखते ही देखते मित्र की पत्नी के सामने ही खूँटी ने हार उगल दिया।
उसे आश्चर्य  हुआ वो शर्मिदा हूई और बच्चो को लेकर महल पहुँची और क्षमा माँगी, बहन भी आ गई,राजा का राज्य वापस मिल गया,जैसे दशा माता ने राजा रानी को धन धान्य पूर्ण किया वैसे ही सबकी दशा सुधारे🙏
जय दशा माता की 🙏🌹




रीमा महेन्द्र ठाकुर (लेखिका)
कहानी -प्रचीन कथाओं पर अधारित"
रानापुर झाबुआ मध्यप्रदेश
भारत