शून्य काल में बदल रहा व्यक्तित्व हमारा थोड़ा थोड़ा
सिमट रहा है अपना भी वर्चस्व हमारा थोड़ा थोड़ा
दीर्घ से लघु और लघु से छोटा एक बिंदु से शून्य सा जैसा
आवाजें है दस्तक देती दस्तूर निभा दो जैसा तैसा
सिसकियां बस सिमट रही है मिट रहा है रेन बसेरा
यादों में है दफन सभी अब राज ना खोलो थोड़ा-थोड़ा
जाता हूं जाने दो अब तो अंतिम तारा एक सवेरा
इधर उधर बस हवा सा बहता ओझल होता वही सबेरा
क्षमा दान कर देना हमको नेत्र आशु जो देता थोड़ा
बस में नहीं अब मेरा जीवन निराश हतास हो रहा थोड़ा थोड़ा
बहुत कसौटी गुटक रही है तिल तिल कर रक्त भी मेरा
चेहरा और बस शब्दों का दर्शन यही है सच्चा कड़वा प्रदर्शन
ना दिया ना दे पाऊंगा खाली लाया कटोरा तेरा
आशाए उम्मीद थी बाकी बह गई पानी बूंद का पहरा
अंतिम यात्रा इंतजार है कब कल बुला ले जीवन मेरा
अंधकारों में आशाओं को खोजता फड़फड़ा ता पंछी तेरा
...✍️लक्ष्मीनारायण🙏

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