नवल और पदमा फिल्म देखकर सिनेमा हॉल से बाहर निकले , पदमा को चुप देखकर नवल ने कहा " क्या हुआ? 
फिल्म पसंद नहीं आई ? अरे, फिल्म तो तुम्हारे नाम पर थी।"

पदमा ने सोचते हुए कहा " क्या फिल्म थी एक लड़की जो इतनी अच्छी तीरंदाजी जानती है लड़ने के बजाय जौहर कर लिया ।"

"उस समय उसे जो ठीक लगा उसने किया " नवल ने कहा।

" नहीं नवल, मैं कराटे जानती हूं वक्त आने पर मैं लड़ूंगी । न कि बिना लड़े ही इस तरह मर जाऊंगी । और फिर ये तो समाज के लिए प्रेरणास्रोत है । ये ऐसा करेंगे तो आम आदमी तो अपने लिए लड़ने की सोच ही नहीं सकते ।"

"अरे बाप रे, तुम तो कहां से कहां पहुंच गई ।" नवल ने हंसते हुए कहा ।

"उस समय अगर लड़कियां तीर चलाना सीख सकती थी तो लड़कियों की सेना क्यों न बनाई गई और अगर सेना नहीं थी तो पद्मावती खुद युद्ध में शामिल हो सकती थी। ऐसे आग में जलने से अच्छा था लड़कर मरती ।"

"ये फिल्म है इसका मजा लो और भूल जाओ ।" नवल ने कहा ।

पदमा ने गंभीरता से कहा  " फिल्म किसी सच्ची घटना पर बनी है, और ये बता रही है कि इज्ज़त बचाने का एक ही रास्ता है कि जान दे दो । जब जान ही देनी है तो लड़कर दो ।

मैं लड़कियों को कराटे सिखाती हूं, अगर मेरे साथ  ऐसा कुछ होता है कि लड़ो या मरो और मैं मरना चुनती हूं तो वे क्या मुझे अपना आदर्श मानेगी । या फिर मेरी कोई  स्टूडेंट लड़ने या मरने में मरना चुनती है तो मेरी दी गई ट्रैनिंग बेकार है ।"

"अरे तुम भी न, पद्मावती को जो ठीक लगा वो किया अब हम क्या कर सकते हैं ?" नवल ने कहा ।

" हम कर सकते है , सबसे पहले ऐसे किरदार का महिमामंडन 
बंद करना चाहिए । उसे आदर्श की तरह प्रस्तुत नहीं करना चाहिए । जो सोच उसकी थी उसे वहीं खत्म कर देना चाहिए,
भुला देना चाहिए ।इस भ्रम को तोड़ना चाहिए कि इज्ज़त बचाने का एक ही रास्ता है आत्महत्या कर लेना ।"



                   धनु दयाल