उनसे मिलने को हम तरसते रहे
मन ही मन वो ये समझते रहे।
मेरी गलियों से वह गुजरते रहे ।
मैं आवाज दूँ वो,ये सोचते रहे ।
उनकी चाहत में हम मचलते रहे।
मेरी चाहत को वो ,परखते रहे ।
कभी उनकी गली में जाना जो हुआ
चिलमन के अंदर से ही निरखते रहे।
इश्क का धुआं दोनों तरफ उठ रहा,
वो नादान बनकर छुपते रहे ।
मुंतसिर हो गए चाहत में उनकी,
गम ए उल्फत में बस तड़पते रहे।
हिज़्र फ़ना न कर दे इस जहां से हमेँ।
इस ख्यालात से हम हर वक्त मरते रहे।
स्नेहलता पाण्डेय" स्नेहिल"
नई दिल्ली

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