कितना कुछ दफ्न है ,मन के कोने मे,
वो बेखौफ दरियादिली उनकी !
वो उनके ,भरोसे पर ,भरोसा करना,
कितनी,बेख्याल ,थी अमशिकी मेरी।
वो रात को जागकर नीदें खोना,
चौकं,कर जागना,और फिर रोना!
इतंहा ,कर गई, वो बेबसी मेरी ,
उम्मीदे,रह गई,तन्हा मेरी ।
याद आता है ,लिहाजा उनका"
वो शर्ते लगाना और हँसना!
पास आकर ,देखना ,माथे की शिकन,
तोड देती है,हँसी उनकी, खुशी मेरी ।
न कसम खाई,न कोई वादा ही किया ,
छोडा भी नही ,और न पकडने  दिया।
भूल मेरी,की ज्जबात ,बिखेरे मेरे.
जीने भी ,नहीदे रही ,रुसवाई मेरी!!


  रीमा महेन्द्र ठाकुर (लेखिका)
रानापुर -झाबुआ मध्यप्रदेश
   भारत