मोह निशा की आकाशगंगा में
डुबकियाँ लगाते समय
अचानक सुनाई दिया
एक शब्द
जागते रहो
जागते रहो
उस दिन मेरी समझ से परे रहा
और मैं सोचने लगी
कि
बचपन में माँ थपकियाँ दे देकर सुला देती थी
फिर
देर रात तक पढ़ते देख
पिताजी भी कहते
सो जा बेटा
अब बहुत रात हो गई है
अचानक जागते देख
उस दिन भाभी भी कह रही थी
क्या हुआ दीदी
अभी तक सोयीं नहीं
मगर आज
उसके शब्द मेरे मन की अतल गहराइयों में उतर
मुझे सोचने पर मजबूर कर रहे थे
सच ही तो कहा था उसने
यदि मैं सो गई
तब तो मेरा
अस्तित्व ही बिखर जायेगा
मगर आज मेरे सोते ही
लोग
चेहरा भी देखना नहीं चाह रहे हैं
और ढ़क दिया है मेरे मुँह को
झूठा प्यार जताते हुए
कुछ गज सफेद चादर से
फिर मुझे चारों ओर से घेर
रो रहे थे
क्या लगता है आपको
कि वह
मेरे लिए रो रहे थे
अरे नहीं रे
वह तो रो रहे थे
सिर्फ और सिर्फ
अपने स्वार्थ के लिए
कितना प्यार उफ
नये कपड़े पहनाकर
गुड़िया की तरह सजाकर
एक घास फूँस की डोली बना
उस पर लिटा
अपने काँधे पर उठा
आँसुओं से मुँह धोते
ले चले एक
महायात्रा की ओर
और मैं भी उनके उस प्रेम में सराबोर हो
भ्रम में झूमती चली जा रही थी
ओह यह क्या
उन्होंने एक प्यारी सी चंदन की सेज सजा
लिटा दिया मुझे
उस पर
पर उनके स्नेह का असली रुप तब दिखा मुझे
जिनके सुख के लिए जिन्दगी भर में
तिल तिल मरती रही
वही आज मुझे
अग्नि में जला रहे थे
मेरी आत्मा चीख रही थी
चिल्ला रही थी
अपना अस्तित्व बिखरता देख
पर कोई नहीं सुन रहा था
और मेरी उस चीख से हमेशा हमेशा को निजात पाने के लिए
कर दी गई मेरी कपाल क्रिया
और मेरी जलन ठंडी भी नहीं
हुई थी
कि सभी इष्ट मित्रों सगे सम्बन्धियों को
दावत दी गई
अपनी विजय श्री के उपलक्ष्य में
खुशियाँ मनायीं गयीं
और मैं अपने घर
गाँव
बस्ती से दूर
शरीर रहित तड़पती रही हूँ
किसी सुनसान स्थान पर
और मेरे पास अब
कुछ भी नहीं बचा
पछतावे के अलावा
अब उसके वह शब्द
मेरे कानों में गूँजते हुए
मेरे मन पर कर रहे हैं असर।
देवयानी भारद्वाज
उसायनी फीरोजाबाद

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