कृष्ण लीलाओं के, कितने हैं चमत्कार,
भरा हुआ नित नयी, लीलाओं से भंडार,
थी रियासत एक, भरत पुर के ही पास ,
थे व्यक्ति एक, ठाकुर भूपेन्द्र सिंग नाम,
भोग विलास में, बिताया पूरा ही जीवन,
धर्म के नाम पर, करवाते थे कभी कथा,
कभी करवाते, भागवत धर्म यही उनका,
करते थे दिखावा, झूठी शान शौकत का,
पत्नी उनकी थी बड़ी, धर्मशीला विश्वासी,
धर्म कर्म में थी,आस्था पक्की बहुत उसकी,
देता हमेशा ताना उसको,बुरा न उसने माना,
लौटे एक दिन शिकार से, भूपेन्द्र सिंग जब,
अपने प्रसादालय को,फूलों से सजा पाया,
आते ही लगे थे, गुस्सा होकर वो चिल्लाने,
प्रगट दिवस है आज,आकर बीबी ने बताया,
बिना कारण चिल्लाते, बता चुकी थी जब में,
महसूस हुयी लज्जा, सुन कर हो गये थे चुप,
भौग विलास में बढ़ी,ठाकुर की रुचि थी जब,
होते गये पत्नी से दूर,वो आयी कृष्ण के पास,
अब रहूँगी वृन्दावन में, प्रण कर लिया उसने,
ठाकुर जी की तैयार, करायी उसने पोशाक,
पता चला ठाकुर को, गायब करायी पोशाक,
वृन्दावन में कर रही, पोशाक का वो इन्तज़ार,
गुमी पोशाक,खबर देने पहुँचा, ठाकुर वृन्दावन,
पत्नी को नीचा दिखाने का,आया मन में विचार,
ढूंढता पत्नी को ठाकुर, जा पहुँचा मंदिर में जब,
खुश हो गयी पत्नी ,विनती सुनी,भगवान ने मेरी,
तुम मंदिर में आ गये, बिहारी जी के करने दर्शन,
सामने बिहारी जी के, ले गयी पकड़ कर के हाथ,
सामने पहुँचा ठाकुर, मूर्ति के, हुआ हैरान परेशान,
चोरी करवायी जो पोशाक, पहने थे वही पोशाक,
बिहारी जी से मिली नजरें, हो गया वो पानी पानी,
रात लग गयी जब, उसकी आँख, आये बिहारी जी,
सपने में उसके, बोले होता है क्यों, तू हैरान परेशान,
रोक नहीं सकती कोई ताकत, कैसे पहुँची पोशाक,
मुझ तक आने में,पोशाक तो क्या, तू भी तो आया,
वृन्दावन खुद चल कर आया, खुली नींद ठाकुर की,
टूटा उसका सपना, घमंड हो गया,उसका चकनाचूर ।
।। बोलो बाँके बिहारी लाल की जय।।
---------*---------
रचना कार -रजनी कटारे
जबलपुर (म.प्र.)

0 टिप्पणियाँ