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आज बात करते है,उस पीढी की जो अनजाने मे ही सही पर ,कर  रही है प्रकृति का दोहन,मनुष्य जीवन के रंगमंच पर खुद को धोखा दे रहा है,इन अल्पकालीन सफलताओं के मिलने से खुद को प्रबुद्ध समझ रहा है.ये विवेक हीनता की परकाष्ठा है,,
विज्ञान चरम पर है,और उसमे आशातीत सफलता भी मिल रही पर,ये सफलता क्या दीर्घकाल है,शायद नही,भौतिक के चक्कर मे हम मनुष्यों ने अपना जीवन अल्प बना लिया ,इसके नतीजे खुल कर हमारे सामनेआ रहे है,करोना जैसी महामारी के रूप मे ,हम घुट रहे आक्सीजन कम हो रहा है,प्रकृति के लिऐ क्या किया हमने ,हरियाली महोत्सव पर सौ पेड लगाये ,अगले दिन हजारो पेड काट दिये , मात्र फाईलो  पर खाना पूर्ति,पानी कम हो रहा ,हर दिन जमीन मे बोरिगं कर पानी की तालाश"फिर एक   बहाना प्रकृति रुठ गई, पर यदि इस तरह से प्रकृति से खिलवाड होता रहा तो हमारी भावी पीढी के हिस्से मे क्या आयेगा" उनकी पीठ पर जिमेदरियों के साथ एक आक्सीजन बाॅटल भी होगी,,कितने समय तक उठा पायेगे  बोझ,मास्क ने तो पहले ही अपनी जगह बना ली,,अब भी यदि मनुष्य सम्भल जाये तो शायद खतरा टल जाये,,नही तो हजारो साल बाद प्राणी भी लुप्त हो जायेगें ,अब भी समय है"विज्ञान को अपना दृष्टिकोण बनाओ,पर प्रकृति  को दरकिनार मत करो ,,हर एक मनुष्य कम से कम पाँच पेड लगाये, यदि दो पेड नष्ट होते है तो तीन बचेगें, विज्ञान के तिकनीक उपकरण को भूमि के लिऐ विकसित करे,भूमि को उपजाऊ बनाये,फिर से गायें, पाली जाये ,देशी खाद का निर्माण कर, उसे इस्तेमाल किया जाय ,न की खाद को,पेड लगाये पेड आक्सीन और बारिश  का अहम् स्त्रोत है ,सरकार  के बारे मे अर्टिकल देने से समास्या का समाधान नही होगा,सब मिलकर कदम बढाओं तभी सरकार और समाज  की नीव मजबूत होगी,हमें खुद कदम बढाना होगा 'खनन रोकना होगा , पेड लगाना होगा,पानी बचाना होगा,एक कदम हम बढायैं एक आपको बढाना होगा जय हिन्द जय भारत🙏🙏🙏🙏🙏



              रीमा महेन्द्र ठाकुर (लेखिका)
            रानापुर -झाबुआ-मध्यप्रदेश-भारत"