आज बेटी से बात करते हुए अचानक एक पुरानी याद ताजा हो गई । सन् 80 - 82 के आसपास मैं प्राइमरी में थी । मुझे अपने जेब खर्च के लिए पच्चीस पैसे मिलते थे । जिसे मैं तीन तरीके से खर्च करती थी । सुबह स्कूल जाते हुए पांच या दस पैसे की चीज लेना, शाम को फिर पांच या दस पैसे की चीज लेना, जो बचता उसे मैं गुल्लक में डाल देती ।
कई बार हम कुछ बच्चे मिलकर कमेटी डालते थे। कमेटी में, हम रोज के पांच या दस पैसे सारे बच्चे, एक बच्चे के पास जमा करते । जिस बच्चे के पास पैसे जमा किए जाते उसे खजांची कहा जाता । हफ्ते में एक बार पर्ची में सब बच्चों के नाम लिखकर पर्ची निकाली जाती । जिस बच्चे के नाम की पर्ची आती सारे पैसे उस बच्चे को दे दिए जाते ।
फिर वापस पूरा हफ्ता सारे बच्चे, तय किए गए पैसे खजांची के पास जमा करते और नियत दिन पर्ची में नाम लिखकर किसे पैसे दिए जाए तय होता । जिस - जिस बच्चे की पर्ची निकल जाती फिर उसका नाम पर्ची पर नहीं लिखा जाता ।
इस तरह से हमारे पास कोई एक हफ्ता इकट्ठे बहुत सारे पैसे हो जाते, तब हमारी खुशी का ठिकाना ना होता था ।