सुबह- सबेरे जब, 
घर -आँगन मैं मैनें , 
रखा ही था कदम ,

बगीचे में लगा पुष्प, 
मुझे देख धीरे से, 
मंद मंद मुसकाया,

मैनें कदम बढ़ाया, 
अपने बगीचे, 
की तरफ़ जब, 

जैसे कह रहा हो, 
बात वो मुझसे, 
अपने दिल की, 

असीम प्यार था, 
भरा दिल में उसके, 
वो भरभरा आया, 

उसने कहा मुझसे, 
क्या ख़ता है मेरी, 
इतना मुझे बता दो, 

कली से बना मैं, 
पुष्प अभी -अभी, 
प्रफुल्ल हो मुसकाया, 

क्यों यूं ही तोड़ा मुझे, 
रोंद क्यों दिया मुझे, 
काम किसी न आया, 

मैं खुश होता हूँ जब, 
चढ़ूं  शीष ईश मैं, 
आशीष उसका पाऊं, 

तब फिर सोचूं मैं, 
जन्म सफ़ल हुआ, 
आज है मैनें माना ।

       काव्य रचना -रजनी कटारे 
             जबलपुर (म.प्र.)